लिवर की बीमारी कब बन जाती है जानलेवा? डॉ. अजिताभ श्रीवास्तव ने बताया कब जरूरी होता है ट्रांसप्लांट

Editor

Editor

Local Desk | Updated: 24 Sep 2026, 01:38 PM IST | 1 min read
लिवर की बीमारी कब बन जाती है जानलेवा? डॉ. अजिताभ श्रीवास्तव ने बताया कब जरूरी होता है ट्रांसप्लांट
Share:

ग्वालियर: लिवर शरीर का एक बेहद महत्वपूर्ण अंग है, जो विषैले पदार्थों को बाहर निकालने, मेटाबॉलिज्म को नियंत्रित करने और पोषक तत्वों को प्रोसेस करने के साथ-साथ पाचन और रोग प्रतिरोधक क्षमता को बनाए रखने में अहम भूमिका निभाता है। लिवर की एक खास क्षमता यह है कि वह खुद को काफी हद तक पुनर्जीवित कर सकता है, लेकिन लंबे समय तक होने वाली क्षति धीरे-धीरे इसकी कार्यक्षमता को इतना प्रभावित कर सकती है कि इसकी भरपाई संभव नहीं रहती। ऐसे मामलों में लिवर ट्रांसप्लांट केवल एक उपचार विकल्प नहीं, बल्कि मरीज के जीवन को बचाने के लिए आवश्यक हो सकता है।

 

जब लिवर शरीर के लिए जरूरी कार्यों को पर्याप्त रूप से करने में सक्षम नहीं रहता, तो इसे एंड-स्टेज लिवर डिजीज कहा जाता है। ऐसी स्थिति में लिवर ट्रांसप्लांट की आवश्यकता पड़ सकती है। 

 

*मैक्स सुपर स्पेशियलिटी हॉस्पिटल, पटपड़गंज के एचपीबी सर्जरी एवं लिवर ट्रांसप्लांट विभाग के सीनियर डायरेक्टर डॉ. अजिताभ श्रीवास्तव ने बताया* “लिवर ट्रांसप्लांट की जरूरत के सामान्य कारणों में हेपेटाइटिस बी या सी के कारण होने वाला एडवांस्ड सिरोसिस, शराब से संबंधित लिवर डिजीज और नॉन-अल्कोहलिक फैटी लिवर डिजीज शामिल हैं। कुछ मेटाबॉलिक या आनुवंशिक लिवर संबंधी बीमारियों में भी ट्रांसप्लांट की आवश्यकता हो सकती है। इसी तरह, लिवर कैंसर के कुछ चुनिंदा मामलों में, जब अन्य उपचार प्रभावी नहीं होते, लिवर ट्रांसप्लांट एक उपचार विकल्प हो सकता है। संक्रमण, विषैले पदार्थों या कुछ दवाओं की प्रतिक्रिया के कारण होने वाला एक्यूट लिवर फेलियर भी तत्काल ट्रांसप्लांट की स्थिति पैदा कर सकता है। 

 

जैसे-जैसे लिवर की कार्यक्षमता कम होती जाती है, शरीर में इसके स्पष्ट संकेत दिखाई देने लगते हैं। मरीज को पीलिया हो सकता है, जिसमें त्वचा और आंखों का रंग पीला पड़ जाता है। पेट में तरल पदार्थ जमा होने के कारण पेट फूलने या सूजन की समस्या भी हो सकती है। लगातार थकान, भ्रम की स्थिति और ध्यान केंद्रित करने में कठिनाई भी हो सकती है, क्योंकि लिवर के ठीक से काम न करने पर शरीर में विषैले पदार्थ जमा होने लगते हैं।  

 

ये लक्षण इस बात का संकेत हो सकते हैं कि लिवर अब शरीर की जरूरतों के अनुसार काम नहीं कर पा रहा है। ऐसी स्थिति में समय पर चिकित्सकीय जांच और ट्रांसप्लांट की आवश्यकता का मूल्यांकन बेहद जरूरी हो जाता है।

 

*डॉ. अजिताभ ने आगे बताया* “हर लिवर बीमारी में तुरंत ट्रांसप्लांट की आवश्यकता नहीं होती। बीमारी के शुरुआती चरण में समय पर उपचार शुरू करने से लिवर को होने वाले नुकसान की गति को धीमा किया जा सकता है और कुछ मामलों में क्षति को काफी हद तक नियंत्रित या सुधारना भी संभव होता है। हेपेटाइटिस के लिए एंटीवायरल उपचार, फैटी लिवर डिजीज में जीवनशैली में बदलाव और शराब से पूरी तरह परहेज करने से बीमारी के नियंत्रण और मरीज के स्वास्थ्य में महत्वपूर्ण सुधार हो सकता है। नियमित मेडिकल मॉनिटरिंग से बीमारी के बढ़ने के शुरुआती संकेतों की पहचान की जा सकती है और डॉक्टर सही समय पर आवश्यक उपचार तय कर सकते हैं। 

 

सर्जरी के बाद भी मरीज की देखभाल लंबे समय तक जारी रहती है। शरीर द्वारा नए अंग को अस्वीकार करने से रोकने के लिए नियमित रूप से दवाएं लेनी पड़ती हैं और लिवर की कार्यक्षमता तथा समग्र स्वास्थ्य की निगरानी के लिए नियमित फॉलो-अप जरूरी होता है।

Comments (0)

Advertisement