15 दिन डकैत निर्भय के साथ रहे पत्रकार विनोद ने खोले सनसनीखेज राज! बताया आधी रात को क्यों होती थी फायरिंग, 20 साल बाद सामने आई बीहड़ों की अंदरूनी कहानी
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भोपाल। सूरज ढलते ही गांवों के दरवाजे बंद हो जाते थे। बीहड़ों की तरफ जाने वाली पगडंडियां वीरान पड़ जाती थीं और रात के सन्नाटे में कभी-कभी गोलियों की आवाज गूंजती थी। यह वह दौर था जब चंबल की धरती पर कानून से ज्यादा खौफ एक नाम का था— निर्भय गुर्जर।
उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और राजस्थान की सीमाओं से लगे चंबल के बीहड़ों में निर्भय गुर्जर का आतंक ऐसा था कि पुलिस के बड़े-बड़े अभियान भी उसके सामने नाकाम साबित हो जाते थे। वह सिर्फ एक डकैत नहीं था, बल्कि एक ऐसा संगठित आपराधिक तंत्र खड़ा कर चुका था जिसने वर्षों तक पुलिस और प्रशासन की नींद उड़ाकर रखी।
करीब दो दशक पहले निर्भय गुर्जर तक पहुंचने वाले चुनिंदा पत्रकारों में वरिष्ठ पत्रकार विनोद शर्मा भी शामिल थे। न्यूज इनशॉर्ट्स से विशेष बातचीत में उन्होंने उन दिनों की कई ऐसी यादें साझा कीं, जो आज भी रोंगटे खड़े कर देती हैं।
‘चंबल का आखिरी किंग’ बनने का सपना
90 के दशक में निर्भय गुर्जर का नाम अपहरण, फिरौती, हत्या और लूट जैसी वारदातों के साथ तेजी से उभरा। उसके खिलाफ मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश में 70 से अधिक गंभीर आपराधिक मामले दर्ज थे। उस पर लाखों रुपये का इनाम घोषित था और पुलिस लंबे समय से उसकी तलाश में थी।
दिलचस्प बात यह थी कि निर्भय खुद को सिर्फ डकैत नहीं, बल्कि चंबल का ‘किंग’ मानता था। वह गरीबों की मदद करने और आर्थिक सहायता देने का दावा करता था। इसी वजह से कुछ इलाकों में लोग उसे ‘रॉबिनहुड’ और ‘मसीहा’ तक कहते थे। निर्भय कई बार चुनाव लड़ने और मुख्यधारा की राजनीति में आने की इच्छा भी जाहिर कर चुका था, लेकिन यह सपना कभी पूरा नहीं हो पाया।
बीहड़ों तक पहुंचना मौत से खेलने जैसा था
वरिष्ठ पत्रकार विनोद शर्मा बताते हैं कि निर्भय तक पहुंचना आसान नहीं था। उसकी लोकेशन किसी को पता नहीं होती थी। वह लगातार अपने ठिकाने बदलता रहता था और किसी पर आसानी से भरोसा नहीं करता था। विनोद शर्मा बताते हैं, “अगर उसे जरा सा भी शक हो जाता था कि कोई मुखबिरी कर रहा है, तो वह बिना एक पल गंवाए गोली चलवा देता था। उसके लिए शक ही सबसे बड़ा अपराध था।
उन्होंने बताया कि निर्भय के बुलावे पर ही कोई व्यक्ति बीहड़ों तक पहुंच सकता था। वहां पहुंचने के बाद वापस लौटना भी उसकी मर्जी पर निर्भर करता था। इंटरव्यू देने के बाद वह पत्रकारों को दो-तीन दिन तक अपने साथ रखता था ताकि यह सुनिश्चित कर सके कि कोई जानकारी पुलिस तक न पहुंचे।
रात में गूंजती थीं गोलियां, जानवर की आहट पर भी खुल जाती थी फायरिंग
विनोद शर्मा बताते हैं कि जब वे निर्भय के गिरोह के साथ बीहड़ों में रुके थे, तब रात के समय अचानक फायरिंग शुरू हो जाती थी।
मैंने निर्भय से पूछा कि आखिर इतनी फायरिंग क्यों हो रही है? उसने कहा कि अगर गिरोह के किसी सदस्य को जरा सा भी शक हो जाए कि कोई आ रहा है, तो फायरिंग शुरू कर दी जाती है। कई बार तो किसी जानवर की आहट पर भी गोलियां चलने लगती थीं।
बीहड़ों का यह माहौल इतना खतरनाक था कि वहां हर पल मौत का साया मंडराता महसूस होता था।
निर्भय की ‘आर्मी’ ने बनाया था अलग साम्राज्य
निर्भय गुर्जर की असली ताकत सिर्फ उसकी बंदूक नहीं थी, बल्कि वह संगठित नेटवर्क था जिसे लोग उसकी ‘आर्मी’ कहते थे। यह कोई आधिकारिक सेना नहीं थी, बल्कि 100 से अधिक हथियारबंद लोगों का ऐसा गिरोह था जो उसके एक इशारे पर अपहरण, फिरौती, हमला या पुलिस से मुठभेड़ तक कर सकता था। गिरोह के भीतर जिम्मेदारियां बंटी हुई थीं। कुछ लोग अपहरण की योजना बनाते, कुछ खुफिया जानकारी जुटाते और कुछ पुलिस की गतिविधियों पर नजर रखते थे।
उसके गिरोह के पास कार्बाइन और अन्य आधुनिक हथियार मौजूद थे। यही वजह थी कि पुलिस के लिए उस तक पहुंचना बेहद मुश्किल हो जाता था।
क्यों नहीं पकड़ा जा सका निर्भय?
विनोद शर्मा बताते हैं कि कई पुलिस अधिकारियों ने निर्भय गुर्जर के नेटवर्क को तोड़ने के लिए गंभीर प्रयास किए।
तत्कालीन भिंड एसपी गाजीराम मीणा, साजिद फरीद शापू और इटावा के एसपी दलजीत सिंह चौधरी ने उसके खिलाफ लगातार अभियान चलाए। कई बार पुलिस उसके बेहद करीब तक पहुंची, लेकिन हर बार वह बच निकलता था। दिलचस्प बात यह रही कि जब-जब पुलिस का दबाव बढ़ा, तब-तब परिस्थितियां बदलती रहीं और अभियान अधूरा रह गया। आखिर इसके पीछे क्या कारण थे, इसका जवाब आज तक पूरी तरह सामने नहीं आ पाया।
2005: जब खत्म हुआ चंबल का सबसे बड़ा आतंक
वर्ष 2005 में आखिरकार वह दिन आया जिसका इंतजार पुलिस वर्षों से कर रही थी। एक मुठभेड़ में निर्भय गुर्जर मारा गया। उसकी मौत के साथ ही चंबल के बीहड़ों में खौफ का एक बड़ा अध्याय समाप्त हो गया। धीरे-धीरे उसका गिरोह बिखर गया। कुछ सदस्यों ने आत्मसमर्पण कर दिया, जबकि कई अन्य पुलिस अभियानों में मारे गए।
निर्भय गुर्जर की कहानी सिर्फ एक डकैत की कहानी नहीं है। यह उस दौर की कहानी है जब चंबल के बीहड़ कानून और अपराध के बीच सबसे बड़ी जंग का मैदान बने हुए थे। आज भले ही चंबल बदल चुका हो, लेकिन निर्भय गुर्जर का नाम अब भी उन किस्सों में जिंदा है जो बीहड़ों की खामोशी में सुनाई देते हैं।